आर्य समाज विवाह एक सरल, शुद्ध और वैदिक परंपरा पर आधारित विवाह है, जिसमें किसी भी प्रकार की फिजूलखर्ची, दिखावा या अनावश्यक रस्में नहीं होतीं। यह विवाह सामान्यतः 2 से 3 घंटे में पूर्ण हो जाता है।
आर्य समाज विवाह की प्रमुख विधियाँ:
- मधुपर्क से सत्कार – वर का स्वागत दही-मधु के मिश्रण से किया जाता है।
- कन्यादान – कन्या का स्वेच्छा से प्रतीकात्मक रूप से दान (समर्पण)।
- पाणिग्रहण (हस्तमिलाप) – वर वधू का हाथ पकड़कर आजीवन सहयोग, प्रेम और विश्वास का वचन देते हैं।
- शिलारोहण एवं लाजाहोम – वधू पत्थर पर पैर रखती हैं और अग्नि में खील (लाज) अर्पित करती हैं।
- परिक्रमा एवं सप्तपदी – दोनों वर-वधू सात फेरे (परिक्रमा) लगाते हैं और सप्तपदी के दौरान सात प्रतिज्ञाएँ लेते हैं, जो विवाह को अटूट बंधन बनाती हैं।
- सिंदूर एवं मंगलसूत्र – वर वधू के मांग में सिंदूर भरते हैं और मंगलसूत्र धारण कराते हैं।
यह समस्त प्रक्रिया वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न होती है, जिसमें पंडित जी द्वारा स्पष्ट अर्थ सहित मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि वर-वधू और उनके परिवारजनों को हर कदम का भाव समझ में आए।
महत्वपूर्ण सूचना: आर्य समाज पटना द्वारा संपन्न सभी विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अंतर्गत पूर्णतः कानूनी रूप से मान्य होते हैं। विवाह समाप्त होने के पश्चात् वैध विवाह प्रमाण-पत्र (Marriage Certificate) तुरंत जारी किया जाता है, जो सरकारी कार्यों, पासपोर्ट, वीजा, नाम-परिवर्तन आदि सभी जगह मान्य होता है।